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For You !!!

Among the chaos of yesterday and today and ever ... Walking , living and facing the world  Dejected- dreadful- disconsolate Where nothing works out and nothing makes sense .. I must say I am still living  I must say  I laugh daily  I must say  I contemplate daily  and I must say , because of you !!! Wish I could write my most romantic lines for you  Breathe with you  and Love you with every ounce of my being !!!


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कभी सोचा है ????

आज दोपहर मे खाना खाने क बाद यूही कुछ देर चुपचाप बैठ गयी तो मेरी दोस्त ने पूछा .... क्या सोच रही है ....
ये तो पता ऩही कि मैं तब तक क्या सोच रही थी ...परअब ये ज़रूर सोचने लगी क़ि वाकई ... क्या सोच रही रही थी...


इसी बीच मेरी नज़र इस शब्द पर पड़ी ... कभी सोचा है कि ये शब्द "सोच" ख़ुद मे  कितना खास और ताकतवर है ..
जो सच नहीं है.... उसे सोच सकते है... महसूस कर सकते हैं ... और जी सकते हैं .....
जैसे कोई रास्ता हो हक़ीकत से परे ... संभावनाओ की ओर !!!
जहाँ ढेरो विकल्प हैं ... जिनपे आपकी कभी नज़र भी नही गयी ...
और जहाँ कुछ भी असंभव नहीं .... कुछ भी नही !!!


.....................




सपना या हक़ीकत , टूटना दस्तूर है….
जिस चीज़ को छुआ , उसका ख़त्म होना दस्तूर है …
मिज़ाज़ बदल रहा है मौसम का इर्द गिर्द
और बदलते माहौल में स्तब्ध खड़ी मैं
शायद.. हर वक़्त का यूही , गुज़र जाना दस्तूर है…
काश कि रोक सकती मैं ….
इस परिवर्तन को
आँखे दिखा कर , चिल्ला कर या प्यार से फुसला कर …….

गुलाबी पर्चा

स्कूल , कोचिंग और तंग चौराहो पे छोटे बच्चो को बैंक ,कोचिंग या शहर के मेन मार्केट मे खुली किसी नयी दुकान के पर्चे बाटते हुए तो आपने देखा ही होगा ... बहुत आम सी बात है |

उस दिन भी कुछ ऐसा ही था शायद .... वो  8-9 साल लड़का किसी नयी दुकान के पर्चो का भारी सा बंड्ल लेके चौराहे पे खड़ा था ... और बेहद उत्साह से आते जाते लोगो को रोक-रोक के पर्चे पकड़ा रहा था | जून की गर्म दोपहर मे  इधर उधर लोगो के पीछे भागते हुए भी उसके चेहरे पे एक चमक थी, जो यक़ीनन उन पर्चो के बदले मिलने वाली चंद कौड़ियो के ख़याल से कायम थी |उसका फुर्तीलपन देख के मेरा ध्यान उस पर चला गया |

मैने देखा की लोग पर्चे लेकर... एक झलक देख कर.. सड़क पे फैक करआगे बढ़ जा रहे थे ....
कुछ ने तो देखना भी ज़रूरी नही समझा और यू ही कागज को मसल कर आगे बढ़ गये ..... इसमे कोई ग़लत बात तोनही ... शायद मैं भी ऐसा ही करती |
इस बीच अचानक एक बड़ी सी गाड़ी आई ..और उसके नन्हे हाथो से कागज का वो बंड्ल छूट गया ...
एक पल के लिए महसूस हुआ जैसे गुलाबी पर्चे की बारिश हो रही हो ...और अचानक उसके शांत चेहरे पे अजीब सी घबराहट छा गयी|
वो सड़क पे इधर उधर दौड. कर …

जाल ...

कल तक तो ठीक ही थी वो जब
हर चेहरा नया था
हर नाम नया था
ये खूबसूरत गलिया , तंग चौराहे और चाय की दुकान ...
हाँ ..सब कुछ तो नया था

खुद से खुश थी
खुद मे खुश थी
सब कुछ सीधा और सटीक था
उसे चाय पसंद थी ...
क्यूकी चाय  स्वाद पसंद था
चलना पसन्द था क्यूकी रास्ता पसंद था

पर आज शायद , वो कुछ बदल सी गयी है
चाय का स्वाद तभी अच्छा लगता है , जब कोई पीने वाला साथ हो
रास्ता तोआज भी वही है ...
पर हसीं ठहाको के बिना मायूस सा लगता है

शायद जिसका डर था हुआ वही
फिर से बेवकूफ़ जाल मे फ़स गयी




एहसास ...

जितना खूबसूरत ये शब्द है , उतना ही गहरा, रहस्यमयी और अंतहीन इसका अर्थ |

कभी कोई छोटी सी चीज़ भी दिल को छू जाती है , और कभी बड़ी सी बड़ी चीज़ पर भी हमारे भीतर से कुछ खास प्रतिक्रिया नही होती |

डर , खुशी, प्यार, आदर, दुख , घबराहट ..... ये सब एक तरह का एहसास ही तो है |

मुझे याद है , एक बार मेरी दादी ने खुद अपने हाथो से खाना बनाया था , और बहुत चाव से बाबा , पापा , अंकल को खिला रही थी | घर की बहुओ ओर बच्चो के लिए ये एकदम असमान्य द्रिश्य था | मैने दादी कोअच्छे मूड मे देख कर मज़ाक मे ही उनसे कह दिया की दादी कभी हमे भी परोस दीजिए .....

और उनकी त्वरित प्रतीक्रिया थी ..... "हाँ.... कम्मे देई ? थाली मे खा लोगी बेटा या प्लेट मे दे ? "

इस वाकये मे वैसे तो कोई खास बात नही ... ऐसा नही की मेरी दादी ने उस दिन पहली बार मुझसे प्यार से बात की थी , ना ही मुझे ज़ोरो की भूख थी .... ना ही मेरा कोई सपना पूरा हो रहा था |

फिर भी ... वो एहसाह .... आज तक महसूस किए हुए सारे एहसासो मे से सबसे अलग और खूबसूरत है ...और आज 12 साल बाद भी मेरे जेहन मे ताज़ा है |  उस एक छड़ मे इतना प्यार भरा हुआ था की उसको व्यक…
पत्थर की लकीरे मिटाने की कोशिश मे
मिट गये हम.... ज़िंदगी को पाने की कोशिशी मे !!!